Wednesday, August 18, 2010

zara idhar bhi: पैसा-वैसा शोहरत-वोहरत ठेंगे पर

zara idhar bhi: पैसा-वैसा शोहरत-वोहरत ठेंगे पर: " केवल कृष्ण रायपुर। बरसों पहले पढ़ी एक कविता के कुछ शब्द याद आ रहे हैं:- एक चिड़िया का बच्चा/ सूरज की तपिश से झुलसने लगा/ तो जाने क्या सूझी..."

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